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| महाप्रलय के बाद अनंत जल में भगवान श्री हरि विष्णु का अद्भुत दृश्य। |
सृष्टि की रचना कैसे हुई?
मनुष्य के मन में सदियों से एक प्रश्न हमेशा उठता रहा है कि आखिर इस संसार की शुरुआत कैसे हुई? यह पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चंद्रमा, तारे, जल, वायु और समस्त जीव-जंतु आखिर कहां से आए? हमसे पहले कौन था और इस सृष्टि की रचना किसने की?
जब भी कोई व्यक्ति रात के अंधेरे में आसमान की ओर देखता है या जीवन के रहस्यों के बारे में सोचता है, तब उसके मन में यह जिज्ञासा अवश्य जन्म लेती है कि इस विशाल ब्रह्मांड का निर्माण आखिर कैसे हुआ होगा।
हमारे सनातन धर्म के ग्रंथों में इन सभी प्रश्नों के उत्तर विस्तार से बताए गए हैं। विशेष रूप से विष्णु पुराण में सृष्टि की रचना का अद्भुत वर्णन मिलता है।
यह केवल एक कहानी नहीं बल्कि हमारे धार्मिक विश्वासों और आध्यात्मिक ज्ञान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस लेख में हम जानेंगे कि विष्णु पुराण के अनुसार सृष्टि की रचना कैसे हुई, ब्रह्मा, विष्णु और महेश की उत्पत्ति कैसे हुई तथा मनुष्य जीवन की शुरुआत किस प्रकार हुई।
महाप्रलय के बाद क्या हुआ?
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विष्णु पुराण के अनुसार सृष्टि की शुरुआत महाप्रलय के बाद हुई। महाप्रलय वह समय था जब संपूर्ण ब्रह्मांड नष्ट हो चुका था। चारों ओर केवल अंधकार ही अंधकार था।
न दिन था, न रात। न पृथ्वी थी और न ही कोई जीव-जंतु। संपूर्ण ब्रह्मांड में केवल जल ही जल दिखाई देता था। वातावरण पूर्ण रूप से शांत था और हर दिशा में केवल “ॐ” की दिव्य ध्वनि गूंज रही थी।
उस समय उस पवित्र ध्वनि के अलावा कुछ भी अस्तित्व में नहीं था। तभी अचानक उस अनंत जल में हलचल हुई और एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ। वह प्रकाश एक विशाल अंडे के समान दिखाई दे रहा था।
उसी दिव्य प्रकाश से एक बालक की उत्पत्ति हुई। यह बालक कोई साधारण बालक नहीं बल्कि स्वयं भगवान श्री हरि विष्णु थे। धीरे-धीरे उस बालक का स्वरूप विशाल होने लगा और भगवान विष्णु शेषनाग पर शयन करते हुए प्रकट हुए।
इसी कारण उन्हें शेषशायी विष्णु भी कहा जाता है।
भगवान विष्णु से सूर्य और चंद्रमा की उत्पत्ति
जब भगवान श्री हरि विष्णु ने अपनी आंखें खोलीं तब उनके तेज से सूर्य देव की उत्पत्ति हुई। इसी कारण भगवान विष्णु को सूर्य नारायण भी कहा जाता है।
इसके बाद भगवान विष्णु के मन से चंद्रमा और असंख्य तारों की उत्पत्ति हुई। इस प्रकार ब्रह्मांड में प्रकाश फैलने लगा और अंधकार धीरे-धीरे समाप्त होने लगा।
इसके पश्चात भगवान विष्णु की नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ। उस कमल पर सृष्टि की रचना करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने ही अंश से एक दिव्य पुरुष को उत्पन्न किया। वही आगे चलकर ब्रह्मा जी कहलाए।
ब्रह्मा जी की उत्पत्ति और उनका प्रश्न
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जब ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई तब उन्होंने अपने आसपास किसी को नहीं देखा। चारों ओर केवल जल और अंधकार दिखाई दे रहा था। वे यह सोचकर चिंतित हो गए कि आखिर वे कौन हैं और उनकी उत्पत्ति कहां से हुई है।
इन प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए ब्रह्मा जी उस कमल की नाल के भीतर प्रवेश करने लगे। वे लगातार भीतर जाते रहे लेकिन कमल की नाल का अंत नहीं मिला। जितना आगे बढ़ते, नाल उतनी ही लंबी होती जाती।
अंत में ब्रह्मा जी वापस लौट आए और जोर से बोले “मैं कौन हूं? मुझे क्या करना चाहिए?” तभी उन्हें एक दिव्य आवाज सुनाई दी। वह आवाज थी “तप करो।”
ब्रह्मा जी की तपस्या
उस दिव्य आदेश को सुनकर ब्रह्मा जी ने कठोर तपस्या आरंभ कर दी। उन्होंने वर्षों तक घोर तप किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान श्री हरि विष्णु उनके सामने प्रकट हुए।
भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी से कहा “हे ब्रह्मा! आप मेरे ही अंश से उत्पन्न हुए हैं। आपका कार्य सृष्टि की रचना करना है।” इसके बाद भगवान विष्णु ने अपने तेज से एक और दिव्य स्वरूप प्रकट किया। यह स्वरूप भगवान शिव का था।
भगवान विष्णु ने कहा “आपका नाम शिव है और आपका कार्य सृष्टि का संहार करना होगा।” इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं की उत्पत्ति हुई।
त्रिदेवों का कार्य विभाजन
- भगवान विष्णु ने तीनों देवताओं को उनके कार्य सौंपे।
- ब्रह्मा जी को सृष्टि की रचना का कार्य मिला।
- भगवान विष्णु को सृष्टि के पालन का कार्य मिला।
- भगवान शिव को सृष्टि के संहार का कार्य मिला।
इसी कारण ब्रह्मा को सृष्टिकर्ता, विष्णु को पालनहार और शिव को संहारक कहा जाता है।
इसके बाद तीनों देवताओं ने अपने-अपने निवास स्थान बनाए।
- ब्रह्मा जी ने ब्रह्मलोक को अपना धाम बनाया।
- भगवान शिव कैलाश पर्वत पर विराजमान हुए।
- भगवान विष्णु क्षीरसागर में निवास करने लगे।
माता लक्ष्मी की उत्पत्ति
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भगवान विष्णु ने अपनी बाईं भुजा से माता लक्ष्मी को प्रकट किया। तभी से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को लक्ष्मीनारायण कहा जाने लगा।
क्योंकि माता लक्ष्मी भगवान के वाम भाग से उत्पन्न हुई थीं, इसलिए उन्हें वामांगी भी कहा गया। यही कारण है कि सनातन धर्म में स्त्री को पुरुष का वामांग माना गया है।
हमारे धर्म में यह मान्यता है कि कोई भी शुभ या धार्मिक कार्य पति-पत्नी को साथ मिलकर करना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि स्त्री के बिना शुभ कार्य अधूरा रहता है।
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| वन के पवित्र वातावरण में कमल पर विराजमान ब्रह्मा जी को सनत कुमार और सप्तऋषि हाथ जोड़कर नमन करते हुए। |
सप्तऋषियों की उत्पत्ति
सृष्टि को आगे बढ़ाने के लिए ब्रह्मा जी ने सबसे पहले चार कुमारों को उत्पन्न किया।
- सनत कुमार
- सनंदन
- सनातन
- सनक
लेकिन ये सभी बालक रूप में थे और संसार चलाने के लिए तैयार नहीं थे।
इसके बाद ब्रह्मा जी ने विचार किया कि सृष्टि के संचालन के लिए ज्ञान आवश्यक है। तब उन्होंने सप्तऋषियों को उत्पन्न किया।
सप्तऋषियों के नाम इस प्रकार हैं:
- कश्यप
- अत्रि
- भारद्वाज
- विश्वामित्र
- गौतम
- जमदग्नि
- वशिष्ठ
इन ऋषियों का कार्य आने वाली मानव जाति को ज्ञान और धर्म का मार्ग दिखाना था।
मनु और शतरूपा की उत्पत्ति
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इसके बाद ब्रह्मा जी ने अपने तेज से एक पुरुष और एक स्त्री को उत्पन्न किया। पुरुष का नाम मनु और स्त्री का नाम शतरूपा रखा गया। मनु और शतरूपा को पृथ्वी पर पहला मानव माना जाता है। इन्हीं दोनों से मानव जाति की शुरुआत हुई।
ब्रह्मा जी ने मनु से कहा “हे मनु! मैंने तुम्हें शक्ति दी है ताकि तुम अपने परिवार की रक्षा और पालन-पोषण कर सको।” फिर उन्होंने शतरूपा से कहा “मैंने तुम्हें प्रेम, करुणा, धैर्य और ममता का गुण दिया है।”
ब्रह्मा जी ने कहा कि स्त्री और पुरुष दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। इनमें कोई छोटा या बड़ा नहीं बल्कि दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
इसके बाद मनु और शतरूपा पृथ्वी पर गए और मानव जीवन की शुरुआत हुई।
सृष्टि रचना का आध्यात्मिक संदेश
सृष्टि की यह कथा केवल धार्मिक कहानी नहीं बल्कि जीवन का गहरा संदेश भी देती है। यह हमें बताती है कि संसार प्रेम, संतुलन और सहयोग से चलता है।
त्रिदेवों की कथा यह सिखाती है कि सृजन, पालन और विनाश प्रकृति के आवश्यक नियम हैं। हर चीज का एक आरंभ होता है और एक अंत भी।
मनु और शतरूपा की कथा हमें यह समझाती है कि स्त्री और पुरुष दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। जीवन को सुंदर बनाने के लिए दोनों का साथ आवश्यक है।
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| ब्रह्मा जी के आशीर्वाद से पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत करते प्रथम पुरुष मनु और प्रथम स्त्री शतरूपा का दिव्य चित्रण। |
सृष्टि की रचना से हमें क्या सीख मिलती है?
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सृष्टि की उत्पत्ति की यह कथा हमें कई महत्वपूर्ण बातें सिखाती है
1. जीवन में संतुलन जरूरी है
जिस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और महेश के अलग-अलग कार्य हैं, उसी प्रकार जीवन में भी हर कार्य का महत्व होता है।
2. ज्ञान का महत्व
सप्तऋषियों की उत्पत्ति यह बताती है कि बिना ज्ञान के संसार का विकास संभव नहीं है।
3. स्त्री और पुरुष दोनों समान
मनु और शतरूपा की कथा यह सिखाती है कि समाज की उन्नति दोनों के सहयोग से ही संभव है।
4. प्रेम और दया जरूरी है
धर्म हमें सिखाता है कि हमें एक-दूसरे की सहायता करनी चाहिए और किसी को दुख नहीं पहुंचाना चाहिए।
निष्कर्ष
विष्णु पुराण के अनुसार सृष्टि की रचना भगवान श्री हरि विष्णु से प्रारंभ हुई। उनके द्वारा ब्रह्मा और शिव की उत्पत्ति हुई और फिर त्रिदेवों ने मिलकर संसार की व्यवस्था बनाई। ब्रह्मा जी ने मनु और शतरूपा को उत्पन्न कर मानव जीवन की शुरुआत की।
यह कथा केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि जीवन के गहरे सत्य को समझाने वाली भी है। यह हमें प्रेम, सहयोग, ज्ञान और संतुलन का संदेश देती है।
आज के समय में भी यदि मनुष्य इन शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाए तो संसार अधिक सुंदर और शांतिपूर्ण बन सकता है।


